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थोड़ा है, थोड़े की जरूरत है: महिला दिवस पर जानें महिलाओं के निजी अनुभव

source – jagran.com

आज पूरी दुनिया में नारीत्व को सलाम किया जा रहा है। हर जगह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर महिलाओं को शुभकामनाएं दी जा रही हैं। आज महिलाएं सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर आगे बढ़ने लगी हैं, लेकिन फिर भी यह बेड़िया रह-रहकर उनको जकड़ने लगती हैं। बेटी के पैदा होने के साथ ही भेदभाव भी पैदा हो जाता है। हर कदम पर उसे जताया जाता है कि वह एक महिला है और उस पर प्रतिबंधों की एक पूरी फेहरिस्त थोप दी जाती है। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर जानें महिलाओं के अनुभव…

मोनिका मीनल का अनुभव

अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं… होता तो पुरुष दिवस भी है साल के ग्‍यारहवें महीने यानी 19 नवंबर को पर इस दिन से काफी कम ही पुरुष अवगत होंगे। क्‍योंकि उन्‍हें जरूरत ही नहीं एक दिन को सेलिब्रेट करने की, वो तो हम महिलाएं हैं जिन्‍हें पुरुष सत्‍तात्‍मक राज में आजादी मिली है और आज का एक दिवस भी हमारे नाम कर दिया गया है।

महिलाओं का एक वर्ग है जो पुरुषों के वर्चस्‍व वाले क्षेत्र में उन्‍हें पीछे कर आगे बढ़ गया है, लेकिन एक ऐसा भी वर्ग है जो अपने अधिकारों और आजादी से वाकिफ होते हुए भी कई मौकों पर अपना मुंह बंद करने में ही समझदारी मानती है। आज भी युवतियां, महिलाएं राह चलते शोषण का शिकार होती रहती हैं। कार की सीट पर ड्राइविंग करती महिलाओं को देख बराबर की कार में बैठा पुरुष यह तंज करने से नहीं चूकता- अरे लिपस्‍टिक लगा कार चला रहीं हैं, कब ठोक दें पता नहीं…! नौकरी के लिए इंटरव्‍यू देने गई युवतियों-महिलाओं की क्षमताओं को संदेह भरी निगाहों से जरूर देखा जाता है।

अभी कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर डिटर्जेंट के एड में भी कुछ ऐसा ही वाकया सामने आया। इसमें दिखाया गया कि एक पिता अपनी विवाहित बेटी के घर में है। बेटी को ऑफिस से लौटकर डिनर, कपड़े मैनेज करने जैसा घर के कामों और बच्‍चे को संभालता हुआ देखता है और वहीं उसका पति हाथ में चाय की प्‍याली लिए टीवी देख रहा होता है। इसे देख पिता एक चिट्ठी अपनी बेटी के नाम छोड़ जाता है, जिसमें वह उससे अपने सामाजिक परंपरा के लिए माफी मांगता है, जिसमें पुरुषों को घर का काम काज करना सिखाया ही नहीं गया है।

हाल में ट्रेंड में आया ‘मी-टू’ कैंपेन काफी अच्‍छा रहा। महिलाएं और युवतियां सामने आयीं पर क्‍या ये मिडल क्‍लास या लोअर मिड्ल क्‍लास की थीं… नहीं। कुल मिलाकर यही लगता है कि ये दिवसों का मनाना या फिर महिला की आजादी की बात करना सब ऊंचे वर्ग के लिए है मिडल क्‍लास या लोअर मिडल क्‍लास की महिलाएं और युवतियां आज भी वहीं हैं… पुरानी परंपराओं के साथ…। यहां की युवतियों और महिलाओं को भी आजादी और स्‍वतंत्रता जल्‍द से जल्‍द मिले… और हमारे लिए मात्र एक दिन नहीं बल्‍कि साल के हर दिन महिला दिवस हो।

आरती यादव का अनुभव

आज महिला दिवस है। सोशल मीडिया पर लोग महिला शक्ति का बखान कर रहे हैं। उनके बारे में बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं, लेकिन यहां सवाल उठता है कि एक महिला होने के नाते मेरे लिए इस महिला दिवस के क्या मायने हैं? मैं एक वर्किंग गर्ल हूं। एक लड़की और महिला होने के नाते मैं समाज से बस एक ही चीज चाहूंगी और वो है हमारी सुरक्षा।

आज भी मुझे रात को घर से बाहर निकलने में डर लगता है, कहीं कई इंसान के रूप में वहशी जानवर मुझे बीच रास्ते में न मिल जाएं। बस और मेट्रो में सफर करने में डर लगता है, कही किसी का गंदा स्पर्श तो मुझे छू नहीं रहा? मेरी एक छोटी बहन है, उसके लिए भी डर लगता है कि कहीं किसी गंदे अंकल या भईया की गंदी नजर तो उस पर नहीं है? अगर वो स्कूल जा रही है तो वो वहां सेफ तो है? मैं जब भी सुबह अखबार पढ़ती हूं वह दुष्कर्म की घटनाओं से भरा होता है। इनमें मासूम बच्चियों के दुष्कर्म की घटनाएं भी होती हैं। वो मासूम बच्चियां जिन्हें रेप का मतलब भी नहीं पता होता है। यह मासूम भविष्य में किस तरह महिला दिवस को मनाएंगी? इन घटनाओं का उनके भविष्य पर क्या असर पड़ेगा?

इस डर के माहौल में जी कर मैं किस तरह इस महिला दिवस को सेलिब्रेट करुं समझ नहीं आता। मुझे उस दिन खुशी होगी, जिस दिन मुझे और मेरी जैसी कई लड़कियों को इस डर से आजादी मिलेगी और हम खुलकर जी सकेंगे। हम महिलाओं ने कई क्षेत्रों में ऊंचाईयों को तो छू लिया है, लेकिन हम आजाद पंछी की तरह उड़ना चाहती हैं, जिसकी कोई सीमा न हो जिससे किसी बंधन में बंधना ना पड़े।

source – jagran.com

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