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अखिलेश और नीतीश का कार्यकाल हो रहा खत्म, विधान परिषद चुनाव की घोषणा

source – .jagran.com

उत्तर प्रदेश और बिहार में विधान परिषद की दो दर्जन सीटों के लिए चुनाव 26 अप्रैल को होना तय हुआ है। निर्वाचन आयोग के अनुसार, उत्तर प्रदेश की 13 और बिहार की 11 सीटों के लिए विधान परिषद के द्विवार्षिक चुनाव 26 अप्रैल को कराए जायेंगे। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सहित 13 विधान परिषद सदस्यों का कार्यकाल पांच मई को और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी सहित 11 सदस्यों का कार्यालय छह मई को खत्म होने जा रहा है।

चुनाव की अधिसूचना नौ अप्रैल को जारी की जाएगी। चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 16 अप्रैल तय की गई है। जबकि 17 अप्रैल को नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी। नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख 19 अप्रैल होगी। मतदान 26 अप्रैल को होगा और इसी दिन शाम को पांच बजे मतगणना भी होगी। आयोग ने दो मई तक चुनाव प्रक्रिया पूरी करने का लक्ष्य तय किया है।

उप्र विधान परिषद में बढ़ेगा भाजपा का दबदबा

उप्र में विधान परिषद की 13 सीटों के लिए भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 26 अप्रैल को मतदान की तारीख घोषित करते ही राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ गई है। अभी हाल में राज्यसभा के चुनाव में भाजपा और विपक्ष के बीच बहुत ही रोमांचक मुकाबला हुआ और भाजपा ने अपनी क्षमता से अधिक नौ सीटें जीतकर बाजी अपने हक में कर ली। लेकिन, इस चुनाव में जीत के लिए भाजपा गठबंधन के पास 11 और विपक्ष के पास दो सीटों पर पर्याप्त विधायक होने से फिलहाल जोड़-तोड़ और क्रास वोटिंग की स्थिति नजर नहीं आ रही है। वैसे राजनीति में कुछ भी कहा नहीं जा सकता है। चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद दावेदारों की परिक्रमा बढ़ गई है। सर्वाधिक सक्रियता भाजपा में है क्योंकि वहां ही सबसे ज्यादा संभावना है।

सपा और बसपा के बीच एक-एक सीट के बंटवारे की संभावना है। पहले सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और प्रदेश अध्यक्ष नरेश चंद्र उत्तम के विधान परिषद उम्मीदवार होने के कयास थे लेकिन, गठबंधन का रंग चटख करने के लिए अब बसपा के भीमराव अम्बेडकर के लिए सपा अपनी एक सीट की दावेदारी छोड़ देगी। कांग्रेस राज्यसभा चुनाव की तरह समर्थक की भूमिका में दिखेगी। यह जरूर है कि इस चुनाव के बाद विधान परिषद में सपा सदस्यों की संख्या घट जाएगी और भाजपा का दबदबा बढ़ेगा।

ध्यान रहे कि पांच मई को सपा अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, नरेश चंद्र उत्तम, उमर अली खान, मधु गुप्ता, राजेंद्र चौधरी, राम सकल गुर्जर, विजय यादव, अंबिका चौधरी (चौधरी बसपा में जाने के बाद इस्तीफा दे चुके), बसपा के विजय प्रताप और सुनील कुमार चित्तौड़, रालोद के चौधरी मुश्ताक तथा प्रदेश सरकार के मंत्री महेंद्र सिंह व मोहसिन रजा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। पिछली बार इनमें आठ सीटें सपा, तीन बसपा, एक भाजपा तथा एक रालोद ने जीती थी। बसपा के जयवीर सिंह के इस्तीफा देने के बाद हुए चुनाव में मोहसिन रजा विजयी हुए थे।

एक उम्मीदवार की जीत के लिए 29 मत की जरूरत

भाजपा के एक विधायक के निधन के बाद विधानसभा सदस्यों की संख्या 402 है। विधान परिषद के एक उम्मीदवार को 29 सदस्यों का मत मिलने पर जीत का कोटा पूरा हो जाएगा। भाजपा गठबंधन के पास कुल 324 सदस्य हैं। गठबंधन के सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के दो सदस्यों की निष्ठा संदिग्ध हो गई है। इसके बावजूद गठबंधन के 322 सदस्य बचते हैं जबकि निर्दलीय रघुराज प्रताप सिंह, विनोद सरोज, अमनमणि त्रिपाठी, निषाद के विजय मिश्र, बसपा के अनिल सिंह और सपा के नितिन अग्रवाल समेत छह अतिरिक्त मत राज्यसभा चुनाव में भाजपा गठबंधन के उम्मीदवारों को मिलने का दावा किया जा रहा है। इस हिसाब से 328 सदस्य भाजपा के पक्ष में दिखते हैं। उधर, सपा की जया बच्चन और बसपा के भीम राव अम्बेडकर को राज्यसभा में मिले मत को मिलाकर 70 हो रहे हैं। दो सदस्यों के मत अवैध हुए थे। इनमें एक सत्तापक्ष और दूसरा विपक्ष के खेमे से जुड़ गए हैं। जबकि दो सदस्य बसपा के मुख्तार अंसारी और सपा के हरिओम यादव जेल में होने की वजह से अपना मत प्रयोग नहीं कर सके।

अगर विधान परिषद चुनाव में दोनों सदस्यों को मतदान की अनुमति मिल गई तो सपा के 46, बसपा के 18 और कांग्रेस के सात सदस्य मिलकर 71 सदस्य होंगे। अगर अवैध मत प्रयोग करने वाले सदस्य अपनी स्थिति में कायम रहे तो भाजपा गठबंधन के पास 329 और सपा-बसपा-कांग्रेस के पास 72 मत हो जाएंगे। ऐसे में भाजपा गठबंधन को आसानी से 11 और सपा-बसपा-कांग्रेस को दो सीटें मिल जाएंगी। अगर एक-दो विधायक दोनों तरफ इधर-उधर भी हुए तो कोई असर नहीं पड़ेगा।

त्याग करने वालों को रिटर्न गिफ्ट की आस

उप्र में जब भाजपा सरकार बनी तो मुख्यमंत्री, दो उपमुख्यमंत्री और दो मंत्री विधान मंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं थे। सरकार में बने रहने के लिए उन्हें किसी सदन का सदस्य होना जरूरी था। तब सपा और बसपा के सदस्यों ने त्यागपत्र देकर उनकी राह आसान की थी। इनमें सपा के अशोक बाजपेई को भाजपा ने राज्यसभा भेज दिया लेकिन, अभी भी सबसे पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए विधान परिषद की सीट छोड़ने वाले सपा के यशवंत सिंह, बुक्कल नवाब, सरोजिनी अग्रवाल और बसपा के जयवीर सिंह का समायोजन नहीं हुआ है। इनमें कई लोगों को रिटर्न गिफ्ट मिलने की उम्मीद है। वैसे भाजपा के सामने संगठन और जातीय समीकरण साधने की भी चुनौती बनी हुई है।

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